युवा दिवस / 'हम दुनिया के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं'

स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द के कारण ही पहुंचा है।

एजुकेशन डेस्क । स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। देश में 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में मनाया जाता है। वे एक प्रभावशाली अध्यात्मिक गुरू थे।  स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को विश्व धर्म महासभा, शिकागो में मोटिवेशनल स्पीच दी थी। उन्होंने अपने शब्दों से शिकागो में हिन्दुत्व और भारत का परचम लहराया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द के कारण ही पहुंचा है। स्वामी विवेकानंद स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य व प्रतिभावान शिष्य थे। जानते हैं उनके शिकागो में दिए गए सबसे चर्चित भाषण के बारे में...

अमेरिकी बहनों और भाइयों,

आपके इस स्नेहर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय आपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया के सबसे पौराणिक भिक्षुओं की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और मैं आपको सभी जाति-संप्रदाय के लाखों-करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मेरा धन्यवाद उन वक्ताओं को भी जिन्होंने ने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति (universal acceptance) का पाठ पढाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते बल्कि हम दुनिया के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं जिसने इस धरती के सभी देशों के सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्राइलियों के शुद्धतम स्मृतियां बचा कर रखी हैं, जिनके मंदिरों को रोमनों ने तोड़-तोड़ कर खंडहर बना दिया, और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने महान पारसी देश के अवशेषों को शरण दी और अभी भी उन्हें बढ़ावा दे रहा है।

भाइयों मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है, और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है-

'जिस तरह से विभिन्न धाराओं कि उत्पत्ति विभिन्न स्रोतों से होती है उसी प्रकार मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, वो देखने में भले सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।'

वर्तमान सम्मलेन, जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, स्वयं में गीता में बताए गए एक सिद्धांत का प्रमाण है, –

'जो भी मुझ तक आता है; चाहे किसी भी रूप में, मैं उस तक पहुंचता हूं, सभी मनुष्य विभिन्न मार्गों पर संघर्ष कर रहे हैं जिसका अंत मुझ में हैं।'

सांप्रदायिकता, कट्टरता, और इसके भयानक वंशज, हठधर्मिता लम्बे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी बार ही ये धरती खून से लाल हुई है, कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और कितने देश नष्ट हुए हैं।

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता। लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है, मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिता, हर तरह के क्लेश, चाहे वो तलवार से हों या कलम से, और हर एक मनुष्य, जो एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं; के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

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