प्राथमिक स्कूल ऐसा हो जिसकी शिक्षा प्राथमिक न हो!

फंडा यह है कि कई तरह के प्रत्यक्ष अनुभव देकर कोई भी प्राथमिक शिक्षा का इस्तेमाल जीवन की मजबूत नींव रखने में कर सकता है। 

एजुकेशन डेस्क। इस सोमवार केवल प्राइमरी यानी प्राथमिक कक्षाएं चलाने वाले और स्कूल को सेकंडरी व हायर सेकंडरी बनाने से इनकार करने वाले सैंटियन इंटरनेशनल स्कूल के कुछ बच्चे राजस्थान के श्रीगंगानगर स्थित पुलिस लेन में आयोजित 'राजस्थान पुलिस दिवस' के कार्यक्रम में शामिल हुए। इन बच्चों ने न सिर्फ गुब्बारों से परेड करने वाले पुलिस अधिकारियों का स्वागत किया बल्कि समारोह में उन्हें कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के साथ अगली पंक्ति में स्थान दिया गया। आमंत्रितों में पास के झुग्गी बस्ती के कुछ बच्चे भी शामिल थे, जिन्हें स्कूल में पढ़ने के लिए पुलिसकर्मियों से आर्थिक मदद मिलती है। जाहिर था कि बच्चे सबसे आगे वाली पंक्ति में बैठकर ही रोमांचित नहीं थे बल्कि उन्हें पुलिस के डॉग स्क्वाड के बारे में भी जानने को मिला, जिन्होंने वहां अपना हुनर प्रदर्शित किया। केवल आर्थिक भिन्नता के अलावा सारे बच्चे हर मामले में समान थे और वे 6 से 10 वर्ष की उम्र के थे।

सैंटियन स्कूल चलाने वाले विकास नाग्रु ने एक असाधारण दृश्य देखा, जो वहां उपस्थित 250 मेहमानों की आंखों से छूट गया। जब सारे बच्चों को स्नैक्स दिए गए, पास के इलाके से एक माह का एक छोटा-सा पपी समोसे की गंध पाकर वहां पहुंच गया और तत्काल बच्चों के दो वर्गों में फर्क पैदा हो गया। कथित इंटरनेशल स्कूल के बच्चे इतने विचलित हो गए कि वे अचानक अपनी सीट से खड़े हो गए और इस तरह उन्होंने उस पिल्ले से खुद को अलग कर लिया, जो किसी को नुकसान नहीं पहुंचा सकता था। जबकि झुग्गी बस्तियों से आए बच्चे शांत रहकर अपने स्नैक्स का लुत्फ लेते रहे, क्योंकि वे हमेशा ऐसे आवारा प्राणियों के साथ ही रहते आए हैं। अपना स्कूल शुरू करने के पहले कई बैंकों में काम कर चुके विकास का मानना था कि किसी राष्ट्र में अच्छी पीढ़ी के निर्माण में प्राथमिक शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और वे उस पर डटे रहेंगे। 

उनके स्कूल की खासियत यह है कि सारे बच्चों को 10 वर्ष की उम्र के पहले असली दुनिया से अधिकतम संभव सामना कराया जाता है। पुलिस स्टेशन जाने से बच्चों में यह भरोसा पैदा होता है कि पुलिसकर्मी भी उनके दोस्त हैं और उनके पालक उन्हें बैंगन या करेला न खाने पर जिस तरह पुलिस का डर दिखाते हैं वैसे 'डरावने' वे होते नहीं। विकास बताते हैं, 'अनाथाश्रम' होकर आने के बाद से वे न सिर्फ अनाथ बच्चों से बल्कि आमतौर पर सभी लोगों के प्रति सहानुभूति रखने लगे हैं और इसलिए देना उनके स्वभाव में आ गया है। ध्यान देने योग्य यह है कि जब वे उपयोग किए कपड़े देते हैं तो उन्हें धोते हैं, उन्हें प्रेस करते हैं और फिर अच्छी तरह पैक करके देते हैं। पास की शेविंग क्रीम फैक्ट्री (चूंकि पास में केवल वही फैक्ट्री थी) जाकर उन्होंने किसी भी उत्पादन प्रक्रिया में होने वाली उत्पादन, पैकेजिंग,अनुशासन, शॉप फ्लोर मैनेजमेंट व अन्य बातें जानी। 

इस तरह असली ज़िंदगी के अनुभव ने उन्हें बीमा विषय पर नाटक प्रस्तुत करने का आत्म-विश्वास जगा दिया। यह ऐसा विषय है, जिसे लेकर वयस्कों में भी काफी भ्रम होता है। हाल ही में इन बच्चों ने यातायात के नियमों का पालन करने वाले दुपहिया चालकों को गुलाब देकर और जो हेलमेट नहीं पहनते थे उन्हें हेलमेट पर बुकलेट भेंट करके शहर में हेलमेट पहनने की आदत पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव डाला है। विकास का दृढ़ विश्वास है कि सांसारिक चीजों का अनुभव व उनका सामना करने से बच्चे मजबूत होते हैं और उनमें अच्छी निर्णय क्षमता विकसित होती है। 
फंडा यह है कि - कई तरह के प्रत्यक्ष अनुभव देकर कोई भी प्राथमिक शिक्षा का इस्तेमाल जीवन की मजबूत नींव रखने में कर सकता है। 

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु 
raghu@dbcorp.in

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर 

 

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