मैनेजमेंट एजुकेशन : एक सोच जो भारत को ले जाती है दुनिया के हर कोने में

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद (IIMA) की स्थापना 1961 में ट्रेन्ड मैनजमेंट प्रैक्टिशनर को तैयार करने के उद्देश्य से की गई थी।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद (IIMA) की स्थापना 1961 में ट्रेन्ड मैनजमेंट प्रैक्टिशनर को तैयार करने के उद्देश्य से की गई थी, जो इंडियन इंडस्ट्री को लीड और मैनेज कर सकें। अपने 56 सालों के इतिहास में, ये संस्थान 15,000 से ज्यादा लोगों को ग्रेजुएट और 30,000 से ज्यादा लोगों को मैनेजमेंट के विभिन्न क्षेत्रों जैसे फाइनेंस, मार्केटिंग, स्ट्रेटजी, लीडरशिप जैसे में क्षेत्रों में अपनी साख बना चुका है।

पिछले 20 सालों से, अपने छात्रों को अंतर्राष्ट्रीय संपर्क प्रदान करने के उद्देश्य से, आईआईएमए यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के 70 से ज्यादा देशों के बिजनेस स्कूलों के साथ एक्सचेंज प्रोग्राम चला रहा है। ये एग्रीमेंट आईआईएमए के छात्रों को न सिर्फ विदेश में पढ़ाई करने का मौका देता है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भी प्रदान करता है। जब भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहा है, तो ऐसे समय में हमारे ग्रेजुएट्स को भारत के बाहर का माहौल समझना बहुत जरूरी है। ये छात्र विदेशों के बारे में सीखते हैं, जो भारत के लिए भी जरूरी है। इनमें से कुछ छात्र आईएएस, आईपीएस और आईएफएस जैसी सिविल सर्विस का भी हिस्सा बनने जा रहे हैं।

इसके साथ ही भारत आर्थिक रूप से बढ़ता है और क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर एक शक्ति बनकर उभरता है, तो भारत को दुनिया के बाकी हिस्सों के छात्रों को अपनी अर्थव्यवस्था, संस्कृति, संवैधानिक ढांचे और आंतरिक बाजार के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। इसी संदर्भ में, एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत आईआईएमए में हर साल 100 से ज्यादा विदेशी छात्र को शिक्षित करता है। एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत छात्रों को बताया जाता है कि भारत में किस तरह काम किया जाता है, उसके इतिहास, उसकी संस्कृति, उसका संवैधानिक ढांचे और भारत में कैसे बिजनेस करना है, आदि बातों के बारे में बताया जाता है। 

एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत, विदेशी छात्रों को हम बताते हैं कि 1947 में भारत को राजनीतिक आजादी कैसे मिली? 1991 में आंशिक आर्थिक स्वतंत्रता कैसे मिली? और 2014 में आंशिक सांस्कृतिक स्वतंत्रता कैसे मिली? 

आजादी के बाद भारत ने तेजी से तरक्की है और इसी वजह से भारत में सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री, फॉर्मास्यूटिकल इंडस्ट्री, टेक्सटाइल, जेम्स, ज्वैलरी और पेट्रो-केमिकल जैसी इंडस्ट्री को स्थापित किया। 

हम भारतीय बाजारों की विविधता के बारे में बताते हैं और लॉन्ग टर्म के लिए भारत में बिजनेस कैसे करना चाहिए, ताकि जल्दी रिटर्न मिले, इस बारे में बताते हैं। भारत में आज जीई, यूनिलिवर और अमेजन जैसी कंपनियां न सिर्फ सफल हुईं हैं बल्कि काफी लंबे समय से भारतीय बाजार में सफलता से काम कर रही हैं।

हम अपने अंतरराष्ट्रीय मेहमानों को भारत और बाकी दुनिया के बीच महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मतभेदों पर प्रशिक्षित करते हैं; ये मतभेद हमें कैसे प्रभावित करते हैं कि ग्राहक उत्पाद और सेवाओं को लेकर क्या सोचते हैं और कैसे खरीदते हैं और पिछले 10 वर्षों में भारत किस तरह से बदल गया है और अगले 10 वर्षों में और कैसे बदल सकता है। उदाहरण के लिए, एंटरटेनमेंट, पैकेज्ड फूड और इटिंग ऑउट की आदतें, सीनियर सिटिजन्स के लिए प्रॉडक्ट और सर्विसेज सेगमेंट के बहुत तेजी से बढ़ने की संभावना है। अधिकांश कन्ज्यूमर प्रॉडक्ट्स के लिए, भारत 130 करोड़ के नहीं बल्कि 5-10 करोड़ ग्राहकों के बाजार के रूप भुगतान करने के लिए देखते हैं- क्योंकि 130 करोड़ का आंकड़ा ज्यादातर कंपनियों के लिए बहुत बड़ा है।  भारत में कानूनी प्रक्रियाएं भले ही धीमी चाल से चलती हैं, लेकिन ये काफी मजबूत और कारगर है।

इस प्रक्रिया में अगले कदम के रूप में, मुझे लगता है कि अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज के तहत आए छात्र जब आईआईएम-ए में पढ़ाई कर रहे हों तो वास्तव में उनके लिए विशेष तरह का कोर्स तैयार करना होगा। जब पढ़ाई करके स्वदेश लौटते हैं, तो वे एक तरह से भारत के  एक्सपर्ट बन जाते हैं और उनके अंदर अपने देश में भारत का एम्बेसडर बनने की क्षमता होती है। ऐसा करने के लिए, मुझे लगता है कि हमें एक समूह बनाना है जिसमें आईआईएम-ए में विदेश से आए एक्सचेंज छात्रों और आईआईएमए के छात्रों को चुना जाए - जहां ये छात्र कम से कम 2-4 कोर्सेज में एक साथ रहें और इस तरह से एक दूसरे के बीच एक बंधन बनाए और आपस में ज्ञान आधारित सोच विकसित करें जो कुछ समय तक बनी रहे। इसका एक छोटा हिस्सा डबल डिग्री प्रोग्राम के रूप में पहले से मौजूद है। जहां एक विदेशी छात्र अपने पहले साल में अपने होम इंस्टीट्यूशन से और दूसरे वर्ष में आईआईएम-ए में और अपने गृह संस्थान और आईआईएमए से दोनों डिग्री प्राप्त करता है। हालांकि, ये संख्या की दृष्टि से देखें तो ये बहुत कम हैं; प्रति वर्ष लगभग 6 से 8। एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत प्रति वर्ष ये संख्या 100 से अधिक छात्रों तक पहुंच सकती है जो भारत के लिए एक गहरा संपर्क स्थापित करेंगे।

बढ़ते अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के इस दौर में जहां कई प्रमुख शक्तियां वैश्वीकरण से पीछे हट रही हैं, संभवत:, आईआईएम-ए भारत के विकास में योगदान दे सकती है और समय के साथ अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रोफ़ाइल को बढ़ा सकती है। दुनिया भर में ऐसे छात्र हैं जिन्हें भारत आने का मौका नहीं मिला लेकिन उन्हें भारत के बारे में  गहरा ज्ञान और जानकारी है और जिसे वे  अपने-अपने देशों में लेकर गए हैं। यह व्यवस्था एक ऐसी सॉफ्ट-पॉवर का हिस्सा होगी जो भारत दुनिया भर में निर्मित और उसका प्रसार कर सकता है। आखिरकार, दुनिया में एक राष्ट्र के रूप में सॉफ्ट-पॉवर का उदय होना एक सशक्त पहल है जो दूसरे देशों को भारत के करीब लाती है और यह अन्य देशों में स्वेच्छा से स्वीकार्य और वांछित होती है। और, दुनियाभर के देशों के कुछ बेहतरीन छात्रों को भारत के बारे में सिखाना उस सॉफ्ट-पॉवर का एक छोटा सा हिस्सा बनाने का एक शानदार तरीका है।

- अरविंद सहाय,   लेखक आईआईएम-ए में प्रोफेसर हैं और ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।

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