12th के बाद ड्रीम काॅलेज का रखें पूरा नॉलेज, री-वेल ऑप्शन भी करें ट्राय

रिजल्ट की टेंशन में जरूरी काम न भूलें। अगर उम्मीद से कम नंबर आते हैं तो री-वेल के लिए अप्लाय करें। एडमिशन के टाइम कॉलेज की पूरी इन्फॉर्मेशन रखें।

एजुकेशन डेस्क। रिजल्ट्स.. ये शब्द सुनते ही स्टूडेंट्स थोड़ी टेंशन में आ जाते हैं। लेकिन उन्हें रिजल्ट के पहले और बाद में टेंशन लेने की जरूरत नहीं बल्कि थोड़ा सा अवेयर होने की जरूरत है। दरअसल रिजल्ट की घबराहट और कॉलेज एडमिशन की टेंशन में स्टूडेंट्स कुछ गलतियां कर देते हैं, जिसके कारण उन्हें आगे जाकर परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसलिए रिजल्ट के बाद स्टूडेंट्स को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसके बारे में एक बार जरूर सोचें। इसके लिए किसी सीनियर की मदद भी ली जा सकती है।

री-चेकिंग के लिए रहें तैयार

रिजल्ट अगर उम्मीद के मुताबिक न आए तो डरें नहीं बल्कि आपके पास री-चेकिंग का ऑप्शन मौजूद है। रीकाउंटिंग के ज़रिए आप अपने मन की दुविधा दूर कर सकते हैं। कई बार टोटलिंग में गलती हो जाती है लिहाज़ा उम्मीद है कि नंबर अच्छे ही आएंगे और ऐसा न हो तो रीकाउंटिंग करवाई जा सकती है।

मिलेगा बहुत सा समय

इस बार भी बोर्ड्स के रिजल्ट्स अप्रैल लास्ट या मई फर्स्ट वीक तक आ जाएंगे। वहीं कुछ बोर्ड के रिजल्ट ही देर से आएंगे। इससे 11th की स्टडी समय से शुरू होगी तो वहीं 12th के स्टूडेंट्स के पास आगे की स्टडी के बारे में सोच-विचार करने का काफी समय रहेगा। जिससे वे कॅरियर के लिए आसानी से फैसला ले पाएंगे। 

इंस्टीट्यूट्स की रैंकिंग करें चेक

अगर पहले से ही डिसाइड कर लिया है कि आगे क्या करना है। या फिर तय कर चुके हैं कि किस कॉलेज/यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेना है तो थोड़ा रुकें। सबसे पहले उस इंस्टीट्यूट की रैंकिंग ज़रूर चेक करें। इसके लिए NIRF की वेबसाइट पर मौजूद इंस्टीट्यूशन Ranking चेक कर सकते हैं। मैनेजमेंट, मेडिकल, यूनिवर्सिटी, इंजीनियरिंग, बेस्ट कॉलेज, फार्मेसी, आर्किटेक्चर, लॉ फील्ड्स के इंस्टीट्यूट की  रैंकिंग मौजूद है। वेबसाइट पर साल 2017, 2016 की रैंकिंग भी मौजूद है

रैंकिंग चेक करने यहां क्लिक करें

शीप टेंडेंसी से बचें

12th के बाद अक्सर देखा जाता है कि स्टूडेंट्स अपने इंटरेस्ट और अपनी क्षमता को पहचाने बगैर ही भेड़ चाल में शामिल हो जाते हैं, जिसका खामियाज़ा उन्हे आगे उठाना पड़ सकता है। इसलिए दोस्तों, ओल्ड क्लासमेट्स के पीछे चलने से बेहतर अपनी कैपेसिटी को पहचानें और उसके बाद ही फील्ड का चुनाव करें। 

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