बेहतर स्पीकिंग स्किल्स दे सकती हैं तरक्की

एक अच्छे स्पीकर का विश्वसनीय होना जरूरी है। जिसके लिए मजबूत स्पीकिंग स्किल्स के साथ-साथ उन गलत आदतों पर भी ध्यान देना होगा, जो आपके संवाद को खराब कर सकती हैं। 

करियर डेस्क । किसी बड़ी कंपनी का सीईओ बनना आपका गोल हो या आप एक स्टूडेंट आंत्रप्रेन्योर हों या फिर जॉब में कई लोगों की टीम को लीड करते हों स्पीकिंग स्किल्स आपके लिए बेहद अहम हैं। ऐसे में आपको न केवल लोगों को प्रशिक्षित करना होगा बल्कि नए आइडियाज भी शेयर करने होंगे। इसके लिए आपका संवाद बेहतरीन होना चाहिए। इस स्थिति में एक अच्छे स्पीकर का विश्वसनीय होना जरूरी है। जिसके लिए मजबूत स्पीकिंग स्किल्स के साथ-साथ उन गलत आदतों पर भी ध्यान देना होगा, जो आपके संवाद को खराब कर सकती हैं। यहां दी गई कुछ आदतों से बचना आपको एक बेहतर वक्ता बना सकता है। 

जरूरत से ज्यादा मुस्कुराना 

वक्ताओं को स्पीच के दौरान संतुलित रूप से मुस्कुराने की ट्रेनिंग दी जाती है। लेकिन श्रोताओं के सामने आते ही कई वक्ता जरूरत से ज्यादा मुस्कुराने लगते हैं। बेहतर होगा कि आप स्वाभाविक मुस्कान दें, जो ऑडिएंस के फीडबैक पर आधारित हो। ज्यादा मुस्कुराना नकली व्यवहार जैसा लगने लगता है। ऐसे वक्ता को लोग गंभीरता से नहीं सुनते। 

तेज आवाज और उतार-चढ़ाव 

चेहरे के हाव-भाव बदलते हुए अत्यधिक तेजी और उतार-चढ़ाव के साथ बोलने वाले वक्ताओं में एक बेचैनी झलकती है। वे न तो सामने वालों तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं और न ही वे उनकी बात ध्यान से सुनते हैं। लोग उनका संदेश सुनने के बजाय उनके शारीरिक हाव-भाव को देखकर उनका मजाक उड़ा सकते हैं। 

उदासीन भाव से बोलना 

उदासीन भाव से बोलना भी आपकी विश्वसनीयता पर उतना ही नकारात्मक असर डालता है, जितना कि बहुत ज्यादा ताकत लगाकर बोलना। खुद को गंभीर दिखाने की प्रक्रिया में वक्ता ऐसा लगता है, मानो वह कुछ छिपा रहा हो। मंच पर वह रोबोट जैसा लगता है और श्रोता उससे जुड़ भी नहीं पाते। 

पलकें झपकाना 

बोलने के दौरान कई वक्ता बार-बार पलकें झपकाते हैं। एक या दो बार पलकों का झपकना ठीक है, लेकिन बार-बार ऐसा करना आपकी पारदर्शिता और आत्मविश्वास पर सवाल खड़े करता है, इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए। इसके बजाय आपको अपने ऑडिएंस से आई कॉन्टैक्ट बनाकर खुद को आत्मविश्वास से भरपूर दिखाना चाहिए।

ड्रेस ठीक करना

जो वक्ता बोलते समय बार-बार अपने बाल और कपड़े ठीक करते हैं तो ऑडिएंस उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। कई स्पीकर नर्वसनेस में खुदको सहज दिखाने के लिए ऐसा करते हैं जबकि सुनने वाले सोचते हैं कि वक्ता कुछ परेशान है और उनका ध्यान उसकी बातों से हट जाता है।
 

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