इन फैक्टर्स के आधार पर चुनिए अपने बिजनेस स्कूल

सही कॉलेज का चुनाव आपकी एम्प्लॉयबिलिटी को मजबूत बनाता है लिए सही फैकल्टी की विशेषता

एजुकेशन डेस्क। सोचैम की एक स्टडी के मुताबिक देश के 5,500 से ज्यादा बी-स्कूल्स से निकलने वाले मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स में से केवल 7 फीसदी ही एम्प्लॉयबल हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि देश के कुछ शीर्ष बी-स्कूल्स को छोड़कर ज्यादातर में औसत या निम्न स्तर की एजुकेशन दी जा रही है जिससे काबिल ग्रेजुएट्स तैयार नहीं हो सकते हैं। ऐसे में अगर आप एमबीए करने का मन बना चुके हैं और मैनेजमेंट का एंट्रेंस टेस्ट देने की तैयारी कर रहे हैं तो आपको अपने बी-स्कूल के चुनाव को लेकर भी काफी सतर्कता बरतनी होगी। ऐसे में कुछ फैक्टर्स हैं जिन्हें ध्यान में रखकर आप न केवल सही मैनेजमेंट स्कूल में एडमिशन ले पाएंगे बल्कि पढ़ाई भी सफलतापूर्वक पूरी कर पाएंगे। 

 

काम का अनुभव

- देश के टॉप मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट्स में जाने वाले 30 से 40 फीसदी कैंडिडेट्स के पास एक या अधिक वर्षों का अनुभव होता है। यह भी देखा गया है कि कुछ टॉप बी-स्कूल्स ऐसे कैंडिडेट्स को पसंद कर रहे हैं जिनके पास ग्रेजुएशन के बाद फुल टाइम जॉब का एक साल से अधिक का अनुभव हो। ऐसे में वर्क एक्सपीरियंस की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता।

 

विदेश से एमबीए डिग्री 

- विदेश से मैनेजमेंट शिक्षा हासिल करने के आकर्षण के पीछे अक्सर यह वजह होती है कि वहां के मैनेजमेंट कोर्सेज में दाखिला देश के टॉप इंस्टीट्यूट्स की तुलना में काफी आसान होता है। अगर आप भी इस दिशा में आगे बढ़ने की योजना बना रहे हैं तो जान लें कि ज्यादातर विदेशी मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट्स में एडमिशन के लिए वर्क एक्सपीरियंस जरूरी होता है। यह भी संभावना है कि कोर्स के पूरा होने के बाद आपको अपनी उम्मीद के मुताबिक प्लेसमेंट न मिल पाए। 

 

इंस्टीट्यूट महत्वपूर्ण है 

- मैनेजमेंट का जो भी कोर्स आपने चुना है उसका महत्व इस पर निर्भर नहीं करता कि वह डिग्री है या डिप्लोमा बल्कि इस बात पर करता है कि उसे आपने कौनसे इंस्टीट्यूट से किया है। कुछ समय पहले तक आईआईएम भी डिप्लोमा कोर्स ही आॅफर किया करते थे। असल में मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स को रिक्रूट करते हुए कंपनी कोर्स का टाइटल नहीं बल्कि उसके वास्तविक मूल्य, इंस्टीट्यूट की प्रतिष्ठा, कोर्स की क्वालिटी और स्टूडेंट की क्षमता को परखती है।

 

स्टूडेंट्स की क्वालिटी 

- पढ़ाई के दौरान आपका ज्यादातर इंटरेक्शन अपने साथी स्टूडेंट्स के साथ ही होता है। ऐसे में आप उनके साथ ग्रुप प्रोजेक्ट्स पर काम करके बहुत कुछ सीखते हैं। अच्छे स्टूडेंट्स के साथ आपकी लर्निंग भी बेहतर होती है। सलेक्शन की प्रक्रिया के मुश्किल स्तर से आप वहां दाखिल किए जाने वाले स्टूडेंट्स की क्वालिटी का अंदाजा लगा सकते हैं। 

 

बी-स्कूल की लोकेशन 

- मैनेजमेंट कॉलेज की लोकेशन कैंपस में होने वाले प्लेसमेंट्स को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। उन शहरों में स्थित इंस्टीट्यूट्स में बेहतर प्लेसमेंट देखा गया है जहां बड़े पैमाने पर इंडस्ट्रीज मौजूद हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके लिए अपने हैडक्वाटर्स के नजदीक के इंस्टीट्यूट्स में जाना आसान होता है। यही वजह है कि मुम्बई, नई दिल्ली और बेंगलुरु में दूसरे शहरों की तुलना में बेहतर प्लेसमेंट होते हैं। लेकिन यह भी सही है कि टॉप के इंस्टीट्यूट्स पर लोकेशन का प्रभाव बहुत कम होता है और रैंकिंग के कम होने पर यह बढ़ जाता है। 

 

इंफ्रास्ट्रक्चर का स्तर 

- एक सही बी-स्कूल का चयन करते हुए इस बात पर भी गौर करें कि वहां स्टेट आॅफ द आर्ट कम्प्यूटर लैब, हाई स्पीड इंटरनेट कनेक्शन, अच्छी बुक्स और मैनेजमेंट लिटरेचर के सब्सक्रिप्शन की सुविधायुक्त लाइब्रेरी और आॅडियो विजुअल एड युक्त क्लासरूम जरूर हों। यह भी देखें कि वहां हॉस्टल की अच्छी फैसिलिटी हो क्योंकि एक फुल रेजिडेंशियल प्रोग्राम में आप फैकल्टी और साथी स्टूडेंट्स के साथ 24x7 संपर्क में रहकर आप अपनी लर्निंग को कई गुना बढ़ा सकते हैं। 

 

फैकल्टी की विशेषता 

- किसी भी अच्छे इंस्टीट्यूट में फुल टाइम और पार्ट टाइम फैकल्टी मेंबर्स का एक बेहतर मिश्रण होना चाहिए। जहां फुल टाइम फैकल्टी स्टूडेंट्स को दो वर्षों तक एक निरंतरता और मॉनिटरिंग के साथ पूरी मदद देती है वहीं पार्ट टाइम फैकल्टी आपको एक्सटरनल एक्सपोजर, इंडस्ट्री में कॉन्टैक्ट्स और रियल टाइम प्रोजेक्ट्स हासिल करने में हेल्प करती है। फैकल्टी की जानकारी हासिल करने के लिए आप इंस्टीट्यूट में पढ़ रहे स्टूडेंट्स से बात कर सकते हैं।

 

प्लेसमेंट रिकॉर्ड 

- बहुत से प्लेसमेंट इंस्टीट्यूट 100 फीसदी प्लेसमेंट रिकॉर्ड का दावा करते हैं। देश के हर कोने में खुल चुके ऐसे इंस्टीट्यूट्स के दावों की पूरी पड़ताल के बाद विश्वास किया जाना चाहिए। इसके बारे में आप वहां के स्टूडेंट्स से बात कर सकते हैं। यही नहीं यहां हर स्टूडेंट को मिलने वाले आॅफर्स की औसत संख्या क्या है, यह भी जांचें। 

 

फीस का अंतर 

- देश के मैनेजमेंट स्कूल्स में ली जाने वाली फीस में बड़ा अंतर देखा जा सकता है। जहां यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट्स में दो वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम की फीस कुछ हजार रुपए होती है वहीं प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट्स में इसी प्रोग्राम की फीस कई लाख रुपए हो सकती है। ऐसे में एड मिशन से पहले अपने बजट पर ध्यान देना जरूरी होगा। 
 

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